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माता-पिता को यूं ना छोड़ें...

, Posted by Madhaw Tiwari at 4:54 AM

27 साल की ज़िंदगी में मैने समय और माहौल से काफ़ी कुछ सीखा... ज़िंदगी कभी वीरान हो जाती... कभी लगता अब तो अंतिम समय आ गया... लेकिन हर बार सम्भलता और कुछ नई सोच के साथ ज़िंदगी फिर अपनी राह पर... जब भी मायूस होता... मां याद आतीं... वास्तव में जीवन में हम कभी-कभार ये सोचते हैं कि अमुक चीज़... या अमुक व्यक्ति हमारे लिए सबसे ज़रूरी है... हमारी ज़िंदगी के लिए ज़रूरी है... लेकिन मां से बढ़कर दुनिया में कोई नहीं... मां के पास चले जाओ आपका सारा दुख वो अपने में समा लेगी... जब माथे पर मां प्यार से हाथ फेरती है... तो लगता है कि बस यही तो है जिसकी तलाश में मैं भटक रहा था...

आज एक प्रोग्रैम प्रोड्यूस कर था... " अकेले जिया जाए ना " मेरे चैनल के कुछ नामचीन लोगों ने ये नाम तय किया था... हालांकि मैं इससे उतना सहमत नहीं था... ख़ैर ये कार्यक्रम बुज़ुर्ग और उनकी हालत को लेकर था... कुछ रिसर्च के बाद मैंने दो स्टोरीज़ लगाई थीं... इन सब से मैं इन लोगों के इतना करीब आया कि मुझे अपनी मां याद आ गईं... उन लोगों पर गुस्सा आ रहा था कि आखिर कुछ लोग कैसे अपने माता-पिता को अकेले छोड़ देते हैं... कैसे उन्हे वो रातें भूल जाती जब वे अकेले सो नहीं पाते थे... आज उनकी देख-रेख करने से वो दूर भागते हैं... उस दिन को पीछे छोड़कर जब वे बारिश में भीग जाते थे... तो मां डांटने के बजाए बड़े प्यार से गीले बालों को पोछा करती थी... आज उन्होने अपने मां-बाप से उनकी ही सम्पत्ति छीन ली है... लेकिन बूढ़े हो गए माता-पिता आज भी उस सम्पत्ति की आस नहीं रखते ... जैसे बचपन में वे पापा के हाथों से पैसे छीन ले जाते.. और पापा खड़े होकर इस बचकानी हरकत पर बस मुस्कुरा दिया करते थे... आज भी उनके बच्चे... बच्चे ही हैं...

वो माता-पिता जो आज एक वृद्धा आश्रम में रहते हैं... और उनके जैसे ही कुछ उनके दोस्त हैं... वही अब उनकी बची ज़िंदगी के हमसफर हैं... वहीं अब सब कुछ हैं... अब आश्रम ही अपना आशियाना लगता है... लेकिन दुआओं में आज भी उनके वही बच्चे हैं... जिन्होने उन्हे यहां अकेला छोड़ दिया... आज भी ये बुज़ुर्ग लोग इश्वर से यही प्रार्थना करते हैं... उनके बच्चे जहां हैं वो खुश रहें...

मुझे तो वो ज़िम्मेदारी ही नहीं निभाने को मिली... कि मैं अपने पिता की सेवा कर पाता... पिताजी उस वक़्त ही गुज़र गए जब मैं उम्र के 15वें पायदान पर था... बाद में घर की ज़िम्मेदारियां मेरे कंधों पर ही रहीं... और बस हमेशा मां ने साथ दिया और मैं आज देवरिया जैसे छोटे शहर से निकलकर दिल्ली में हूं... जो कर रहा हूं उससे संतुष्ट हूं... लेकिन एक टीकस रहती है मन में कि पिता का साथ नहीं रहा... जीवन में जब भी कोई सफलता मिलती.. ये टीस और बढ़ जाती... उनकी सेवा करने का अवसर इश्वर ने मुझसे छीन लिया... लेकिन मां के प्रति ज़िम्मेदारियों का जहां तक वहन कर पा रहा हूं.. करता रहूंगा...

दुख की बात है कि मुझे तो मौका नहीं मिला... लेकिन जिसे इश्वर अपने माता-पिता की सेवा करने का मौका दिया है... वो क्यों इससे वंचित नहना चाहते हैं... मैं ऐसे लोगों से विनम्र प्रार्थाना करूंगा कि कृपया अपने वृद्ध माता-पिता को यूं ना छोड़ें... आप जहां भी हैं वो उनकी की वजह से हैं... सबसे बड़ी बात कि आपके इस दुनिया में होने की वजह ही वही हैं...

Currently have 3 comments:

  1. इतनी बड़ी बात इतने कम उम्र में।

  1. माधव भाई, बहुत ही अच्छा लेख लिखा हे आप ने, हमारी आज की पीढी इसे भुलती जाती हे, जिस ने मां बाप की सेवा कर ली, उसे पुजा पाठ की जरुरत नही,
    धन्यवाद,अगर मेरी राय माने तो अपने लेखो को थोडा मोटे शव्दो मे लिखे, दुसरा अगर हो सके तो यह *Word Verification* हटा दे जिस से टिपण्णी देने मे कठनाई ना हो.

  1. Anonymous says:

    Raj Bhatia ji... Der se jawab dene ke liye Kjhama chahunga... aap logo ka saath chahiye... khair aapke kahe anusar maine word varification hata dia hai... ab aap azani se comment kar sakate hai..

    dhanyavad

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