आंखों में आंसू हों.. तो एक बिहारी चेहरा बिहारी लगता है
, Posted by Madhaw Tiwari at 9:21 PM
उस बच्ची की आंखों में आंसू अच्छे लगते... उस बच्ची से बिछड़ने पर उसका पिता दुखी ना होता... लेकिन उस वक़्त.. जब हाथों में में मेंहदी होती... और वो रास्ता घर से ससुराल जाने का होता... लेकिन वो वक़्त कुछ और था... प्रलय के बीच में परिवार.., अपने मुखिया से दूर जा रहा था... उसे पता भी नहीं था कि महासागर बन गए इस बिहार में उसे खड़े होने के लिए ज़मीन कहां मिलेगी.. ज़मीन मिलेगी... तो खाने के लिए.. जीने के लिए ज़रिया कहां से मिलेगा... और वो भी मिला तो जाने कब पिता से मुलाक़ात होगी... कुछ महीनों बाद यहां की ज़मीन भले सूख जाए... लेकिन शायद ही इस जीवन में इन आंखों के आंसू कम होंगे... शायद कोसी का ये सैलाब रूक जाए... लेकिन आंखों से बहते इस सैलाब को कौन रोकेगा...
देश के किसी दूसरे राज्य में ऐसा प्रलय होता तो इस तरह चुप्पी नहीं होती... लेकिन ये बिहार है... और बिहारियों को सरकार ने हमेशा एक ज़रिया समझा है... सस्ते मज़दूरों का ज़रिया... रैलियों के लिए सस्ती भीड़ का ज़रिया... और चुनावी गाड़ी के आसान और सस्ते चालकों का ज़रिया... अब तो लगता है कि नेता को बिहारी चेहरे में बेबसी और लाचारी देखना ही अच्छा लगता है... आंखों में आंसू हों.. तो एक बिहारी चेहरा बिहारी लगता है... शायद देश के व्यापारियों को भी ऐसा ही लगता है... तभी तो उनकी भी ज़ुबान खामोश है... और उस ज़मीन के लोगों के लिए ही खामोश है जो सालों से उनके व्यापार में ईधन का काम कर रही है...
सरकार और कारोबारी ही क्यों देश की जनता भी उसी रंग में रंगी दिखती है... मदद के लिए कोई हाथ नहीं बढ़ा रहा... अनेकता में एकता के लिए भारत जाना जाता है... भारतीय जाने जाते हैं... लेकिन वो एकता यहां क्यों नहीं दिखती... क्यों बिहार को बहने के लिए छोड़ दिया है... क्यों नहीं उनके लिए देश एक हो रहा है...
देश के किसी दूसरे राज्य में ऐसा प्रलय होता तो इस तरह चुप्पी नहीं होती... लेकिन ये बिहार है... और बिहारियों को सरकार ने हमेशा एक ज़रिया समझा है... सस्ते मज़दूरों का ज़रिया... रैलियों के लिए सस्ती भीड़ का ज़रिया... और चुनावी गाड़ी के आसान और सस्ते चालकों का ज़रिया... अब तो लगता है कि नेता को बिहारी चेहरे में बेबसी और लाचारी देखना ही अच्छा लगता है... आंखों में आंसू हों.. तो एक बिहारी चेहरा बिहारी लगता है... शायद देश के व्यापारियों को भी ऐसा ही लगता है... तभी तो उनकी भी ज़ुबान खामोश है... और उस ज़मीन के लोगों के लिए ही खामोश है जो सालों से उनके व्यापार में ईधन का काम कर रही है...सरकार और कारोबारी ही क्यों देश की जनता भी उसी रंग में रंगी दिखती है... मदद के लिए कोई हाथ नहीं बढ़ा रहा... अनेकता में एकता के लिए भारत जाना जाता है... भारतीय जाने जाते हैं... लेकिन वो एकता यहां क्यों नहीं दिखती... क्यों बिहार को बहने के लिए छोड़ दिया है... क्यों नहीं उनके लिए देश एक हो रहा है...



हम बिहारीयों में भी इच्छाशक्ति प्रबल हो , तो ऐसी दुर्दशा नहीं होगी , पर गलती हमारी भी है। हम भी एक दूसरे का सहयोग नहीं कर पाते , आगे बढ़ने को चिंतित नहीं होते । आखिर हमारे सारे नेता तो बिहारी ही हैं , वे आगे बढ़कर हमारा हक क्यों नहीं दिलाते ?
sangeeta ji yatharth to yahi hai ki bihar ke log sahaj hi sab kuch sweekar kar lete hai bale vo ghalat hi kyu na ho... lihaza sahi yahi hai ki neta jan se apana haque lena hoga