, Posted by Madhaw Tiwari at 8:13 AM
मुंबई हमलों के बाद हर जगह श्रद्धांजलियां देने का दौर चल रहा है... ठीक है... श्रद्धा है तो श्रद्धांजलि देनी चाहिए... हर बार दी जाती है... जयपुर में मारे गए तब भी दी गई थी... दिल्ली में मारे गए तब भी दी गई... असम में मारे गए तब भी दी गई... और अब मुंबई में मारे गए हैं तो भी दी जा रही है... और जितने ज़्यादा संख्या में मारे जाते हैं... उतनी ही ज़्यादा श्रद्धांजलियां दी जाती हैं... मुंबई में ज़्यादा मारे गए तो ज़्यादा श्रद्धांजलियां... और बस एक दिन श्रद्धांजलियां ख़त्म हो जाएंगी... हम और आप उस हमले को भूल जाएंगे.. और तब तक याद नहीं करेंगे.. जब तक आतंकी इस देश पर एक और ज़ख़्म नहीं दे देते...
आपको शायद बुरा लगे लेकिन वक़्त श्रद्धांजलि देने का नहीं है.. वक़्त है कि कुछ सार्थक कदम उठाए जाएं... ये जाना जाए कि आख़िर आतंकवाद का मकसद क्या है... कहां से ये ज़हर हमारे देश में आ रहा है... और आ रहा है तो उसे हम क्यों नहीं रोक पा रहे... कौन है इसका ज़िम्मेदार?
हर आतंकी हमले के बाद हमारे ख़ुफ़िया तंत्र को ज़िम्मेदार ठहरा दिया जाता है... कहा जाता है कि ये उनकी नाकामी है... कोई बताएगा कि इतने बड़े देश में सुरक्षा तंत्र कैसा बनाया जाए कि वो एक सौ दस करोड़ की जनता में दहशतगर्दों को तलाश सके... क्या ऐसा तंत्र बनाना मुमकिन है? यहां ये समझना ज़रुरी है कि किसी हमले के तुरंत बाद सुरक्षा तंत्र को ज़िम्मेदार क्यों ठहराया जाता है? बहुत साधारण सी बात है हमारे नेता अपनी नाकामी को छुपाने के लिए सुररक्षा तंत्र के कंधे का इस्तेमाल करते हैं... वो अपनी कमज़ोरी छुपाते हैं.. जनता सुरक्षा तंत्र में उलझ जाता है और नेता बचकर निकलने में कामयाब हो जाते हैं...
लेकिन अब हमे खड़ा होना होगा... हमें इन नेताओं से जवाब मांगना होगा.. आखिर ये क्या कर रहे हैं... आतंकवाद के ख़िलाफ़ इन्होने अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के अलावा क्या किया... कभी इनके विरोध में कोई कड़ा कदम उठाया... अगर ऐसा किया होता तो ये हमले ना होते... नेताओं ने अगर आतंकियों के साथ नरमी बरतने की जगह एक जुट होकर उनका जवाब दिया होता तो देश को ऐसे ज़ख़्मों से ना गुज़रना पड़ता...
सवाल उठता है कि ऐसे में हमें क्या करना चाहिए...
सिर्फ तख़्तियां लेकर... सड़क पर नारेबाज़ीकर... और धरनाकर हम विरोध जताते रहे... तो हर कदम हमारी आवाज़ को भी दबाया जाता रहेगा... ज़रूरी है कि हम एक सार्थक कदम उठाएं... सार्थक कदम यही है कि हम ऐसे नेताओं को वोट ही ना दें... इसका मतलब ये नहीं कि वोटिंग के दिन हम घर पर बैठे रहें... हमें पोलिंग बूथ तक जाना है... और वहां फॉर्म 17A की मांग करनी है... फॉर्म 17A उनके लिए है जो ये कहना चाहते हैं कि चुनाव में खड़े किसी नेता पर उन्हे भरोसा नहीं है.. आपको भी अगर ऐसा लगता है तो फॉर्म 17A भरकर अपना विरोध जताएं... आपको लगता है कि आपके नेता आतंकवाद के विरोध में कड़े कदम नहीं उठाते.. तो उनके ख़िलाफ़ अपना विरोध जताएं...
अगला सवाल है कि जनतंत्र में जनसेवक का चुना जाना ज़रूरी है...
तो इसके लिए हमें राजनीति को कोसने के बजाए इसे एक नौकरी के तौर पर सामने लाना चाहिए... जब ये एक जॉब के तौर पर सामने आएगी तो हम और आप ख़ुद इसे अपनाने की सोचेंगे.. अपने बच्चों को इसके लिए प्ररित करेंगे.. ये किसी की बपौती नहीं रहेगी... इसलिए ज़रूरी है कि युवा वर्ग में ये बात डाली जाए.. कि राजनीति गंदी नहीं है.. हमारे राजनेता सही नहीं हैं और उनकी वजह से राजनीति गंदी दिखने लगी हैं... इसकी सफाई करने के लिए हमे और आपको ही इसमें उतरना होगा.. इस गंदगी को साफ करना होगा..
आइए हम भारत की राजनीति को साफ करने के लिए उतरें... सामने आएं और उन नेताओं को निकाल बाहर करें जो हमारे बारे में सोचते तक नहीं... जो सिर्फ अपने ही हित के बारे में सोचते हैं... भले जनता का अहित हो रहा हो... तो अगली बार वोट देते हुए इन बातों को ज़रूर ध्यान में रखें...


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