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जागों हिंदुस्तान.. जागो हिंदुस्तानियों




आख़िर कब जागेंगे हम? कब जब एक बार फिर भारत गुलाम हो जाएगा? अगर हम इसी तरह इंतज़ार करते रहे... हाथ पर हाथ धर के बैठे रहे... तो देश के हालात अग्रेंजों के शासन से बुरे होंगे... आतंक भारत की रगों में समाता जा रहा है... धर्म के नाम पर रोज़ाना क़त्लेआम हो रहे हैं... क्या यही वो लोकतंत्र है... जिसमें धर्म निरपेक्षता को हमने सबसे ऊपर रखा था... क्या यही वो लोकतंत्र है जिस पर हम अनेकता में एकता होने पर नाज़ करते रहे हैं... शायद वो लोकतंत्र कहीं खोने लगा... राजनीति का दीमक इस लोकतंत्र को खा रहा है... और पीछे छोड़ता जा रहा है... वो आतंक जिसमें क्षेत्रवाद है... धर्मवाद है... जातिवाद है... भाषावाद है... बोलीवाद है... हर जगह भारतीयों को बांटा जा रहा है... पहले तो भारतीय इसे साज़िश का हिस्सा मानते थे... लेकिन अब भारतीयों के अंदर ये सारे वाद घर बनाने लगे हैं... हम अंदर से किसी और शासित होने लगे हैं... हमारी ख़ुद की आज़ादी हमसे छीनने की कोशिश की जा रही है... ये वक़्त है कि हम जागें... उठें.. और लड़ें... देश के लिए लड़े... देश की एकता के लिए लड़े.. ख़ुद के लिए लड़ें... जवाब दें उनका जो ख़ुद खड़ा करने के लिए हमारी लाशों की ज़मीन तैयार कर रहे हैं...

राज ठाकरे कौन हैं... कौन हैं राज ठाकरे जो किसी से कह दे कि तुम महाराष्ट्र में तब तक नहीं रहोगे जब तक तुम्हे मराठी न आती हो... राज ठाकरे को ये अधिकार किसने दिया.. इस तरह की बातें करने वाले भी आतंकी हैं... राज ठाकरे वो आतंकी हैं जो बोली और क्षेत्र के नाम पर मारकाट करता है.. तानाशाही फैलाता है..

नरेंद्र मोदी जब हिंदूत्व के नाम पर भड़काऊ भाषड़ देते हैं... तो लोग उसे क्यों सुनते हैं... कहीं न कहीं धर्म के लिए दिल में कमज़ोर कोना होता है... और तोगड़िया और नरेंद्र मोदी जैसे लोग उसी कमज़ोर कोने पर वार करते हैं... दूसरे धर्म के ख़िलाफ़ खड़े होकर.. उनके ख़िलाफ़ आतंक तैयार करके अपनी राजनीति चमकाते हैं... बजरंग दल देश भर में बवाल मचाता है... लेकिन हम उसे स्वीकार कर लेते हैं.. जबकि वो भी आतंक का चेहरा है...

बजरंग दल और इंडियन मुजाहिदीन पर अभी तक प्रतिबंध नहीं है... लेकिन जो इंडियन मुजाहिदीन से जुड़ा है वो आतंकवादी है... और बजरंग दल से जुड़ा है वो नहीं है... क्यों.. ऐसा क्यों है... दोनों ही दल आतंक के अलग-अलग चेहरे हैं.. जो देश भर में मौत का खेल... खेल रहे हैं...

बदलना होगा हमे... बदलना होगा सरकारी रवैये को.. हम जब तक ख़ुद को नहीं बदेलेंगे... तब तक इस लोकतंत्र में राजनीतिक तस्वीर भी नहीं बदलेगी.. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई हैं हमारे लोक तंत्र में... भौंकने की नहीं... बुखारी.. नरेंद्र मोदी.. राज ठाकरे जैसे आतंक के ठेकेदारों को रोकना होगा... कठोर कदम उठाने होंगे..

वक़्त आ गया है कि हम खड़े हों... देश की राजनीति में जो गंदगी आई है उसे साफ करें... मजाल है कि जिस देश की एक अरब से ज़्यादा जनता खड़ी हो जाए... तो कोई इस मुल्क पर आंख उठा कर भी देखे... मजाल है की ये एक अरब लोग एक होकर मजबूती से आतंक के इन सौदागरों के सामने खड़ी हो जाए... तो कोई हमारे घर में गंदगी भी कर पाए... लिहाज़ा वक़्त आ गया है... जागों हिंदुस्तान.. जागो हिंदुस्तानियों..

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यही कोई 6 बजकर 25 मिनट हुए होंगे... आलोक पालिका बाज़ार से निकला ही था... और सेंट्रल पार्क के पास मेट्रो स्टेशन के पास पहुंचा... कि दूर देवरिया से उसके पापा का फ़ोन आया... वो घबराए थे... सांसें पूरी रफ्तार में थीं... जानना चाहते थे कि उनका बच्चा कैसा है... उन्होने शायद कुछ इसी तरह पूछा.. कहां हो टोनी (आलोक के घर का नाम)... करोलबाग़ में बम फ़टा है... ये सुनकर टोनी को आश्चर्य हुआ.. अभी तो वो करोलबाग़ से पालिका बाज़ार आया था... फ़ोन पर बात करते-करते वो चंद कदम आगे निकल गया... अभी वो पापा को अपना हाल बता रहा था... तभी उसके पीछे एक धमाका हुआ... टोनी की आवाज़ बंद... ऊधर पापा की आवाज़ बंद... वहां आस-पास सबकी आवाज़े बंद... चंद सेकंड्स के बाद चीख-पुकार.. हो हल्ला... कोई वहां ज़ख़्मी पड़ा है... कोई वहां ख़ून से लथपथ... ऊधर टोनी के पापा फ़ोन पर चिल्ला रहे हैं... और टोनी की आवाज़ नहीं निकल रही है.. अभी तो उसने मौत को सामने देखा था... वही मौत जो अगर फ़ोन ना आता तो शायद उसकी होती... धमाका उसी कूड़ेदान में हुआ था... जिसके पास पालिका बाज़ार से निकलकर टोनी रुका था... उसकी आंखें उस मौत के मंज़र की गवाह हैं... एक बाबा जो रोज़ाना उसी कूड़ेदान के पास बैठकर अपने बच्चों की रोटी के लिए जद्दोजहद करते थे... लोगों के हाथ देखा करते थे... उनका भविष्य बताया करते थे... लेकिन मौत कहां किसी को दिखती है... कहां किसी को बताकर आती है... वो तो दबे पांव आई और उस धमाके में बाबा सिधार गए... मौत के सामान के पास से कई गुज़रे होंगे... लेकिन निशाना बने बाबा... टोनी भी वहीं खड़ा था... लेकिन वो बम शायद उसके लिए नहीं था

आंखों में आंसू हों.. तो एक बिहारी चेहरा बिहारी लगता है

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उस बच्ची की आंखों में आंसू अच्छे लगते... उस बच्ची से बिछड़ने पर उसका पिता दुखी ना होता... लेकिन उस वक़्त.. जब हाथों में में मेंहदी होती... और वो रास्ता घर से ससुराल जाने का होता... लेकिन वो वक़्त कुछ और था... प्रलय के बीच में परिवार.., अपने मुखिया से दूर जा रहा था... उसे पता भी नहीं था कि महासागर बन गए इस बिहार में उसे खड़े होने के लिए ज़मीन कहां मिलेगी.. ज़मीन मिलेगी... तो खाने के लिए.. जीने के लिए ज़रिया कहां से मिलेगा... और वो भी मिला तो जाने कब पिता से मुलाक़ात होगी... कुछ महीनों बाद यहां की ज़मीन भले सूख जाए... लेकिन शायद ही इस जीवन में इन आंखों के आंसू कम होंगे... शायद कोसी का ये सैलाब रूक जाए... लेकिन आंखों से बहते इस सैलाब को कौन रोकेगा...

देश के किसी दूसरे राज्य में ऐसा प्रलय होता तो इस तरह चुप्पी नहीं होती... लेकिन ये बिहार है... और बिहारियों को सरकार ने हमेशा एक ज़रिया समझा है... सस्ते मज़दूरों का ज़रिया... रैलियों के लिए सस्ती भीड़ का ज़रिया... और चुनावी गाड़ी के आसान और सस्ते चालकों का ज़रिया... अब तो लगता है कि नेता को बिहारी चेहरे में बेबसी और लाचारी देखना ही अच्छा लगता है... आंखों में आंसू हों.. तो एक बिहारी चेहरा बिहारी लगता है... शायद देश के व्यापारियों को भी ऐसा ही लगता है... तभी तो उनकी भी ज़ुबान खामोश है... और उस ज़मीन के लोगों के लिए ही खामोश है जो सालों से उनके व्यापार में ईधन का काम कर रही है...

सरकार और कारोबारी ही क्यों देश की जनता भी उसी रंग में रंगी दिखती है... मदद के लिए कोई हाथ नहीं बढ़ा रहा... अनेकता में एकता के लिए भारत जाना जाता है... भारतीय जाने जाते हैं... लेकिन वो एकता यहां क्यों नहीं दिखती... क्यों बिहार को बहने के लिए छोड़ दिया है... क्यों नहीं उनके लिए देश एक हो रहा है...

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