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वो तीन रातें
Posted by Madhaw Tiwari
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ख़ौफ़ की तीन रातें... मौत की तीन रातें... ये वो तीन रातें हैं जब मुंबई थम गई... कहते हैं मुंबई की ज़िंदगी रात में सांस लेती है... वो पूरी रात जागती है... वो कभी सोती नहीं... वो कभी रुकती नहीं... समय के पहिए के साथ मुंबई चलती रहती है... चलती रहती है और बस चलती रहती है... इन तीन रातों को भी मुंबई नहीं सोई... रुकी भी नहीं... लेकिन यहां ज़िंदगी के लिए सांसे कम पड़ रही थीं... पूरी मुंबई में सन्नाटा था... रह-रहकर आवाज़ें आ रही थीं... वो आवाज़ें कभी बंदूक से निकली गोली की होती... तो कभी हथगोलों के धमाकों की...
बीच-बीच में एमबुलेंस और शव वाहिनी के सायरन की आवाज़ें भी सन्नाटें को चीर रही थीं... फौजी बूट भी मौत की धुन में निशान छोड़ रहे थे... अगर कहीं सन्नाटे के निशान नहीं थे... तो वो थे मुंबई के अस्पताल... किसी के पेट से ख़ून रिस रहा था... किसी के पैर में इतने ज़ख़्म थे कि वो उठ नहीं सकता था... किसी के सीने में बारूद इस कदर भर दिया गया था... कि उसकी सांसे थम चुकी थीं... और इन सब के बीच अपनों को ओझल होता देख रही आंखे बहती जा रही थीं... दर्द चीख रहा था... कोई ईधर पड़ था कोई उधर पड़ा था...
मुंबई जाग रही थी... और मुंबई के साथ देश भी जाग रहा था... नेता हो... पुलिसवाला हो... कमांडो हो... फौजी हो... पत्रकार हो... या देश का कोई भी नागरिक... सब जाग रहे थे... वो इसलिए नहीं जग रहे थे क्योंकि उनके पेशे का फर्ज़ उन्हें जगा रहा था... वो इसलिए जग रहे थे क्योंकि देश के लिए ये उनका फर्ज़ था... क्योंकि मानवता के लिए ये उनका फर्ज़ था...
मुंबई जाग रही थी... और मुंबई के साथ देश भी जाग रहा था... नेता हो... पुलिसवाला हो... कमांडो हो... फौजी हो... पत्रकार हो... या देश का कोई भी नागरिक... सब जाग रहे थे... वो इसलिए नहीं जग रहे थे क्योंकि उनके पेशे का फर्ज़ उन्हें जगा रहा था... वो इसलिए जग रहे थे क्योंकि देश के लिए ये उनका फर्ज़ था... क्योंकि मानवता के लिए ये उनका फर्ज़ था...
ये बातें भी मैं ही लिख रहा हूं.. यकीन मानिए मुंबई के लिए अपना कलेजा थामे इस देश के ज़हन में ये फर्ज़ आते ही नहीं... वो कोई सवाल नहीं करते.. वो तो बस यूं ही निकल पड़ते हैं... जो जान हथेली पर रख गोलियों के बीच में जाता है... साथियों को शहीद होता देखता है... लेकिन उससे कोई ख़ौफ़ नहीं आता... सीने में और हिम्मत आती है... ख़ुद भी शहीद हो जाने का जज़्बा हिलोरे मारने लगता है.. ये जज़्बा देश और मानवता के लिए प्यार का है... और इसी जज़्बे ने आतंकियों को ढ़ेर भी कर दिया...
1903 में बनी ताज की हवेली... भारत के दरवाज़े पर शान से खड़ी थी.. 105 सालों से खड़ी थी.. इतिहास को बयां करती इस हवेली में एक और इतिहास जुड़ गया है... लेकिन डर ये भी है कि कहीं सिर्फ इतिहास में न रह जाए ये हवेली... इस हवेली में कई मौते हुई हैं... और इन मौतों का असर तो पड़ेगा ही... विदेशी पर्यटकों पर निर्भर इस हवेली का ज़र्रा-ज़र्रा ख़ून से सन चुका है... हर कदम पर मौत के भूतिया निशान है... हो सकता है ये हवेली मौत के पन्नों को भुलाकर उस दर्द से उबर जाए... लेकिन अगर कहीं इस हवेली की बात होगी तो... मौत और दहशत की ये तीन रातें भी याद की जाएंगी..
कहते हैं मुंबई का पानी नमकीन है... वो नमकीन है इसलिए क्योंकि उसमें नमक है पूरे भारत का... उस नमक में घुली हैं हज़ारों सभ्यताएं... लाखों रस्मों-रिवाज़... और ये पानी... और नमकीन हो जाता है जब इसमें गिरता हैं यहां के लोगों का पसीना... उस पसीने का ना कोई धर्म है... ना कोई जाति... ठीक उसी तरह जैसे आतंकियों का कोई धर्म नहीं है... कोई मज़हब नहीं है... ठीक उसी तरह जिस तरह इन आतंकियों से लड़नेवाले जवानों का ना कोई मजहब है ना कोई धर्म... ठीक उसी तरह जैसे इस हमले के शिकार हुए लोगों का ना कोई मजहब है ना कोई धर्म...

