उस रात कुछ राहगीर मिले थे मुझे
उनमें कुछ दोस्त थे
कुछ सफ़र के फ़साने थे
कहने को कुछ अफ़साने बयां किए हमने
मुद्दतों के अरमान बहलाए हमने
ग़र मुमकिन होता सच को ज़बां करते हम भी
चंद अल्फाज़ में इल्तज़ा रखते हम भी
हम भी उन्ही के कारवां का हिस्सा हैं
उन्ही की ज़िंदगी का टूटा किस्सा हैं
कह देते तो जिगर में जन्नत होती
कह देते तो पूरी हर मन्नत होती
हम भी उनके दिल में हासिल होते
उन्ही की सांसों में धड़कन के काबिल होते
जी लेते चंद पलों की उम्र हम भी
कहीं और न तलाश करते ज़िंदगी अपनी





















