कोई मुझे मां दिला दे


मासूम आंखों में सौ तूफ़ान हैं
इन तूफ़ानों में कई सवाल हैं
बेचैनी को छुपाना नहीं जानती ये आंखें
इधर-उधर घूमती हैं... देखती हैं..
पापा-मम्मी की बाट जोहती हैं ये आंखें
उसके ज़हन में तो पापा एक बहादुर हैं
लेकिन असल में एक कायर है
जो ज़िंदगी से हारकर
अपनी बिटिया से ही दूर भाग गए
अभी तो ढाई साल ही हुए ज़िंदगी के
इतने में ही लगता है
इस मासूम को जीना आ गया
कुछ लोग हैं
जिनमें मां का अक्स दिखता है
मासूम होठों पर हंसी आती है
तो वो अक्स भी हंसता है
लेकिन उसे अक्स नहीं
उसे मां चाहिए
उसकी आंखों की आवाज़ तो यही कहती है
सावालों के तूफ़ान में
मां की आस झलकती है...
जैसे कह रही हो
कोई मुझे मां दिला दे
कोई मुझे गोदी उठा ले
कोई मुझे बेटी बना ले

जिस वक़्त इस बच्ची की मां ने अस्पताल में दम तोड़ा, उसी वक़्त इसके पिता एम्बुलेंस ले आने की बात कह कर निकले और वापस नहीं लौटे... अब ये बच्ची अनाथ है... इसके पड़ोसी देख-रेख कर रहे हैं... लेकिन इस बच्ची को एक मां चाहिए.. अगर कोई गोद लेना चाहता है तो सम्पर्क कर सकता है...

बच्ची का नाम - एकता

केयरटेकर - कुलवंत (पठानकोट)

फोन नं. 9463496854

धूल मेरी सहेली


गांव की धूल पैरों में लगी थी
और मैं जहाज से लाल ज़मीन पर उतरी थी
वहां की बत्तियां
अच्छी लग रही थीं
मैं भी अब
खिलखिला रही थी

गांव की वही धूल लेकर
मैं वापस गांव आ गई
पता नहीं क्यों
यहां अनजाने चेहरे भी
मुझे पहचान रहे थे
मैं परेशां सी उन्हे देखती
और वो मुझे प्यार दे रहे थे

वो लोग चले गए, वापस नहीं आए
लेकिन गांव की वो धूल
आज भी वहीं है
आज भी वो लिपट जाती है
मेरे पैरों से
जैसे कह रही हो
मैं रहूंगी सदा तुम्हारी
तुम्हारी सहेली

ये धूल मेरे सपने जानती है
मेरे अरमान रोज़ाना देखती है
हंसती हूं तो खुशी से उड़ जाती है ये धूल
रोती हूं तो
मेरे आंसूओं से जम जाती है ये धूल

और यही धूल देती है
मुझै हौसला
कहती है
पूरा होगा पिंकी का सपना

ख़ून के साथ सूख गए सपने...

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जाने कैसे ज़िंदगी में
ये मौत के पल आ गए
घर से निकला था
कामायाबी की इबारत लिखने
लेकिन ज़िंदगी ने
ये कैसा दर्द लिख दिया
नसों से ख़ून का
इक-इक कतरा सूखा दिया
मां बाऊजी के सपनों में
मेरा भी एक सपना था
वो सपने भी
मेरे ख़ून के साथ
सूख गए
कैसे कहूं कि
मेरी हिम्मत
जवाब दे रही है
कैसे कहूं कि
मेरी सांसे हर लम्हा
टूट रही हैं
पर मैं हार नहीं मानूंगा
यकीन है मुझे
मैं लौटूंगा
मैं ज़िंदगी की कहानी
ख़ुद लिखूंगा
और करुंगा
अपने सपनों को साकार
संजीव बीएससी एग्रीकल्चर का
छात्र है, कृषि वैज्ञानिक बनना चाहता है... लेकिन उसकी ज़िंदगी में अंधेरा छा गया
है... उसे ए प्लास्टिक एनिमिया नाम की बीमारी हो गई है... उसके शरीर में ख़ून नहीं
बनता... उसे रोज़ाना ख़ून की ज़रुरत पड़ती है... इलाज के लिए बोन मैरो ट्रांसप्लांट
ज़रूरी है... और उसके लिए चाहिए 10 से 12 लाख रुपए... ग़रीब परिवार के पास इतने
पैसे नहीं हैं और उन्हे मदद की ज़रुरत है.. फिलहाल उसकी दवाओं के लिए उसके कॉलेज के
दोस्त कानपुर की सड़कों पर भीख मांग रहे हैं... और रोज़ाना उसके टीचर और दोस्त ख़ून
देने के लिए लखनऊ संजय गांधी अस्पताल पहुंच रहे हैं... संजीव को आर्थिक मदद
चाहिए...
संजीव का पता
सेवक राम
ग्राम - संकिसा
पोस्ट - संकिसा
ज़िला - फ़र्रुखाबाद
(उत्तर प्रदेश) पिन कोड है 205302
फोन - 9452121043...

ऐ ज़िंदगी साथ निभा दे...

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लम्हा ज़िंदगी उससे छूट जाना चाहती है...
मौत है जो उसकी रूह में समा जाना चाहती है...
ख़ून का कतरा कतरा बह रहा है...
और ज़िंदगी है जो अपनी ज़िद नहीं छोड़ना चाहती है...
वो छोटा है... मासूम जान है वो...
अपनी तकलीफ़ से परेशां मां को देखकर परेशां है वो...
वो जीने की चाह रखता है...
लेकिन
हर लम्हा ज़िंदगी उससे छूट जाना चाहती है...


मथुरा में रहनेवाले मासूम जितेंद्र को हिमोफिलिया है... शरीर में कहीं कट जाता है
तो ख़ून नहीं रुकता... उसे महंगे इंजेक्शन की ज़रूरत पड़ती है... लेकिन परिवार की
हालत ख़राब है... आर्थिक तौर से कमज़ोर हो गया है... ऐसे में उसकी ज़िंदगी के
लिए... हौसलों के साथ ही सरकारी मदद की ज़रूरत है...


ये है उसके ख़ून की कमज़ोरी...
जान के लिए अमृत है ज़रूरी..
अब तो..
चंद सिक्के... चंद लम्हों के वास्ते रोक पाती हैं उसकी ज़िंदगी...
वो लड़ रहा है अपनी ज़िंदगी से...
वो लड़ रहा है अपनी मौत से...
मासूम सांसे उसके हौसले की मुरीद बन गई हैं...
वो जितेंद्र है...
उसने जीतना ही सीखा है...
और यकीं है..
ज़रुर जीतेगा जितेंद्र
पता :-
विजय कुमार नागपाल
475/4, नारायणपुरी, दयाली प्याऊ
बेसिक शिक्षा अधिकारी के ऑफ़िस के पास
मथुरा (उत्तर प्रदेश)

फोन:- 9897848327

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