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Saturday, February 18, 2012

सच को ज़बां करते हम भी



उस रात कुछ राहगीर मिले थे मुझे
उनमें कुछ दोस्त थे
कुछ सफ़र के फ़साने थे
कहने को कुछ अफ़साने बयां किए हमने
मुद्दतों के अरमान बहलाए हमने
ग़र मुमकिन होता सच को ज़बां करते हम भी
चंद अल्फाज़ में इल्तज़ा रखते हम भी
हम भी उन्ही के कारवां का हिस्सा हैं
उन्ही की ज़िंदगी का टूटा किस्सा हैं
कह देते तो जिगर में जन्नत होती
कह देते तो पूरी हर मन्नत होती
हम भी उनके दिल में हासिल होते
उन्ही की सांसों में धड़कन के काबिल होते
जी लेते चंद पलों की उम्र हम भी
कहीं और न तलाश करते ज़िंदगी अपनी
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Sunday, February 5, 2012

मैं कवि हूं



मैं कवि हूं
मैंने ज़मीन पर सितारे देखे हैं
मैंने उड़ते हुए घरोंदे देखे हैं
देखे हैं मैंने रंगों को अंधेरों में
सांसों में मौसम के मिज़ाज़ को
मैं कवि हूं
मैंने नदियों को हाथों से लपका है
मैंने सदियों को लम्हों में पकड़ा है
छू लिया है क्षितिज को भी
अनगिनत को हथेली पर गिना है
मैं कवि हूं
मेरी कलम ज़िंदगी की पटवारी है
मेरी ज़िंदगी शब्दों की व्यापारी है
न मैं कुछ कहता हूं, न मेरी कलम कहती है
बस खयालों का सागर पन्नों पर उड़ेलती है
मैं कवि हूं


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Thursday, January 19, 2012

किसी रोज़ तुम घर आना


किसी रोज़ तुम घर आना
बैठेंगे, चाय की चुस्कियां लेंगे
कुछ तुम कहना
कुछ मैं कहूंगा
खुलकर दोनों गप्पे मारेंगे
हो सकेगा तो
टहलने भी चलेंगे
थोड़ा तो वक़्त निकालो
कभी तो दरवाज़े पर दस्तक दो
तुमको देखे तो जैसे ज़माना हो गया
तुम आओगी तो
घर की फ़िज़ा बदल जाएगी
बेस्वाद लगनेवाला निवाला भी
लज़ीज़ हो जाएगा
तुम आओगी तो
घर की फ़िज़ा बदल जाएगी
कुछ पल के लिए ही आओ
सबसे चेहरों पर मुस्कुराहट आ जाएगी
खुशी हमारे घर की ओर भी
कभी क़दम तो बढ़ाओ

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Friday, December 23, 2011

संभलकर चलना ‘माधव’

ये नाज़ुक दौर है
संभलकर चलना माधव
तिलिस्मी दुनिया में
हर मोड़ पर तमाशा है माधव
चलना, गिरना, फिर उठकर चलना
हालात ने हर पैंतरा सीखा दिया
इंसान था कभी
दुनियादारी ने औज़ार बना दिया
बाबूजी ने कहा था
अपने पैरों पर खड़े हो जाओ
कुछ करो ज़िंदगी बना लो
पर ज़िंदगी बनती कब है
ये जद्दोजहद ठहरती कब है
अब संभले तो संभले कैसे
बदले नहीं तो जीये कैसे
माधव हमेशा पीछे ही रहता है
हर बार कोई न कोई आगे होता है
ये नाज़ुक दौर है
संभलकर चलना माधव
तिलिस्मी दुनिया में
हर मोड़ पर तमाशा है माधव
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Friday, December 16, 2011

अनंत

तब मैं छोटा था
अनंत को लेकर परेशां रहता
क्या है अनंत
कौन है अनंत
क्यों है अनंत
सवालों का ऐसा घेरा
किसी और शब्द ने नहीं बुना था
शायद यही अनंत की ताक़त है
जो तब अनबूझ थी
आज भी है
ये उधेड़-बुन उत्तर तलाशती है
हर वस्तु में अनंत को झांकती है
घड़ी का चलना
हवा का बहना
सूरज का निकलना
चांद का सारी रात जगना
सब अनंत ही तो है
और वो जो फाटक पर बना स्वास्तिक है
वो भी तो अनंत है
कहां से शुरू होता है
कहां ख़त्म होता है
कुछ नहीं पता
न कोई ओर है
न कोई छोर है
हर तरफ से समान
बिल्कुल मां के प्यार की तरह
न कोई छल
न कोई कपट
और न ही कोई सीमा
वो भी तो अनंत है
बताया था गुरु ने
जिसकी सीमा नहीं वो अनंत है
क्षितिज और आकाश की तरह
अब भी है असमंजस माधव
धरती की गोलाई भी अनंत है
सीमा है, पर ओर-छोर नहीं
पवन की पुरवाई भी अनंत है
सीमा है, पर नाप-तोल नहीं
क्या अनंत की नहीं कोई परिभाषा
हर बार क्यों है नए उत्तर की अभिलाषा
ये दुविधा है या कोई अंतरद्वंद
जो भी है, वो है अनंत
अनंत स्वयं ही अनंत लगता है
न उसकी परिभाषा मिलती है
न कोई उत्तर साथ देता है
अनंत स्वयं में ही अनंत लगता है
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Wednesday, December 14, 2011

Hello Mr. President

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Uttar Pradesh is the hot cake of Indian Politics and the battle field is being prepared by all the political parties in UP. As far as Congress is concern, General Secretary Rahul Gandhi has again taken charge and he is building his reliable youth team for the 2012 War. In this process Youth Congress has elected their Lok Sabha and Vidhan Sabha in-charge for every constituency and assembly area. On Tuesday Manvendra Tiwari was elected as the President of Deoria Sadar Assembly Area. He is very enthusiastic and energetic youth, who believes in hard working and dedication. In very short span of time he became a Youth Icon in his city Deoria. A self-made man and a versatile personality with modern thinking, who joined hand with Congress to inspire his generation to come into politics and change the face of their very own locality and the Nation as well.

 
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Sunday, December 11, 2011

लगता है शहर में कोई तूफ़ान आनेवाला है


Curtsey: http://blogs.gonomad.com

 
मेरे घर की खिड़की से आजकल ठंडी हवा आती है
लगता है शहर में कोई तूफ़ान आनेवाला है

एक नई तारीख़ से पुरानी आवाज़ उठनेवाली है
लगता है तख़्तों-ताज की शामत आई है

राम की धरती से इंकलाब की धूल उड़ी है
मुल्क़ की गलियां भी अब कुरुक्षेत्र लगती हैं

समंदर की लहरों में भी आफ़त की आहट है
अब ये जनता कामयाबी की राह पर निकली है

मेरे घर की खिड़की से आजकल ठंडी हवा आती है
लगता है शहर में कोई तूफ़ान आनेवाला है


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