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75 लाख बनाम 3 करोड़ : नसीहत से ज़्यादा खर्चा
Posted by Madhaw Tiwari
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दादा अपने सहयोगियों को नसीहत दे रहे हैं कि वो विमान के इकॉनमी क्लास में सफर करें... और ख़ुद पूरे के पूरे विमान में सफर कर के विदेश यात्रा पर जानेवाले हैं... यानी ख़ुद फिजूलखर्ची नहीं रुकती और दूसरों को नसीहत देते फिर रहे हैं...दरअसल वित्तमंत्री अक्टूबर के पहले हफ़्ते में विश्व बैंक की बैठक के लिए इस्तांबुल और वित्तमंत्रियों की बैठक में हिस्सा लेने के लिए साइप्रस जाना है... और सूत्रों की माने तो वित्तमंत्री इसके लिए ख़ास प्रधानमंत्री के विमान का इस्तेमाल करेंगे... वो विमान जो ख़ास तौर पर प्रधानमत्री के सफर के लिए है... उसे लेकर वित्तमंत्री इन बैठकों में जानेवाले हैं...

वित्तमंत्री को पता है कि एक पूरा विमान ले जाने और व्यवसायिक उड़ान में जाने... इन दोनों के खर्चे में ज़मीन आसमान का अंतर है फिर भी शायद प्रणब दा को यहां फिजूलखर्ची नहीं दिखती... इस्तांबुल जाने में सात घंटे और साइप्रस जाने में साढ़े छै घंटे का वक़्त लगता है... और इन चंद घंटों के लिए पीएम के आलीशान विमान को ले जाने के लिए 3 करोड़ का खर्च आएगा... जबकि अगर यही यात्रा साधारण व्यवसायिक विमान से की जाए तो खर्च आता है 75 लाख के करीब...
प्रणब दा पहले ख़ुद तो फिजूलखर्ची रोकिए फिर किसी को नसीहत दीजिए...
पीएम का अभिभाषण
Posted by Madhaw Tiwari
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Indian
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तारीख बदलकर, एक बार फिर आत्मसात करें...

हम, भारत के लोग,
भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न
समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिये,
तथा उसके समस्त नागरिको को:
सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय,भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न
समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिये,
तथा उसके समस्त नागरिको को:
विचार अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता,
प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिये,
तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और
राष्ट्र की एकता और
अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिये
दृढ़संकल्प होकर
अपनी इस संविधान सभा में
आज तारीख २६ नवंबर, १९४९ ई०
(मिति मार्गशीर्ष शुक्ला सप्तमी, संवत् दो हजार छह विक्रमी)
को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।
कृपया तारीख 26 नवम्बर, 1949
की जगह
आज की तारीख रखें
और एक बार फिर
अपने संविधान को
आत्मसात करें
मां तुम सच बोलती हो....
वैसे मेरी मां को कोई न्यूज़ चैनल पसंद नहीं… लेकिन कहीं कुछ अच्छा या बुरा दिखता है तो रुक जाती हैं... कल भी ऐसा ही हुआ.. चैनल सर्फ कर रही थीं.. आज तक पर स्टार प्लस के सीरियल सच का सामना पर कार्यक्रम चल रहा था... जिसमें दिखाया जा रहा था कि इस सीरियल के ख़िलाफ़ किस तरह से देश में अलग-अलग जगहों पर विरोध प्रदर्शन हो रहे थे... कुछ सेकंड रुकने के बाद माता जी का अगला पड़ाव था एनडीटीवी इंडिया... देबांग सच का सामना को लेकर मुक़ाबला कर रहे थे... कार्यक्रम में स्टार प्लस के एंकर राजीव खण्डेलवाल भी मौजूद थे... एनडी का ये पूरा कार्यक्रम सच का सामना के ख़िलाफ़ थी... मां ने बस इतना कहा “बकवास” और आगे बढ़ गईं... आगे एक चैनल पर कोई फ़िल्मी गाना चल रहा था... छोटे-छोटे कपड़ों में लड़कियों का डांस... अब मां का गुस्सा बाहर आ गया था... कहने लगीं एक सीरियल जो सच दिखा रहा है उसके ख़िलाफ़ सब खड़े हो रहे हैं... और ये सब जो हो रहा है इसके ख़िलाफ़ नहीं खड़े हो रहे... अगर भारतीय संस्कृति सच दिखाने से ख़राब हो रही है.. तो ये क्या है.. ये तो इस संस्कृति में जैसे चार चांद लगा रहा हो.. जो सब मौन हैं.. और मज़े से घर में देखते रहते हैं..
मां से मैंने कहा सच कड़वा होता है लोग बर्दाश्त नहीं कर पाते... मां ने जवाब दिया.. ग़लत जुमला है ये सच कड़वा नहीं होता.. सच तो ईश्वर है... सच हमेशा प्रिय होता है... सुननेवाले को कड़वा लगता है ये अलग बात है... कहा भी गया है सत्यम् शिवम् सुंदरम्.. सत्य ही शिव है... और शिव ही सुंदर है... यानि सत्य सबसे सुंदर है... मैंने बहस को बढ़ाने के लिए कहा अगर ऐसा है तो ये चैनलवाले बेवकूफ हैं जो इस पर बहस कर रहे हैं... मेरी मां आक्रामक हो गईं... बोल पड़ी मैं होती तो इनका मुंह नोच लेती... देश की संस्कृति की बात करते हैं... और संस्कृति में आग लगानेवाले यही हैं... और वो सच दिखानेवाला कार्यक्रम किस तरह से भारत की संस्कृति को नुकसान पहुंचा रहा है.. ये कोई नहीं बता रहा.. सब बस यही कह रहे हैं कि किसी के बेडरूम के सवाल पूछकर सामाजिक माहौल ख़राब किया जा रहा है... समझ में नहीं आता इससे सामाजिक माहौल कैसे ख़राब हो रहा है... कोई बताए भी तो कैसे सामाजिक माहौल ख़राब हो रहा है...
ख़ैर अब मैं इससे ज़्यादा अपनी मां से बहस नहीं कर सकता था.. क्योंकि मैं भी उस कार्यक्रम का समर्थक हूं... मां से बहस करने का मतलब बस इतना था कि एक अनुभवी महिला जो समाज का हिस्सा है उनकी सोच क्या है...
मां से मैंने कहा सच कड़वा होता है लोग बर्दाश्त नहीं कर पाते... मां ने जवाब दिया.. ग़लत जुमला है ये सच कड़वा नहीं होता.. सच तो ईश्वर है... सच हमेशा प्रिय होता है... सुननेवाले को कड़वा लगता है ये अलग बात है... कहा भी गया है सत्यम् शिवम् सुंदरम्.. सत्य ही शिव है... और शिव ही सुंदर है... यानि सत्य सबसे सुंदर है... मैंने बहस को बढ़ाने के लिए कहा अगर ऐसा है तो ये चैनलवाले बेवकूफ हैं जो इस पर बहस कर रहे हैं... मेरी मां आक्रामक हो गईं... बोल पड़ी मैं होती तो इनका मुंह नोच लेती... देश की संस्कृति की बात करते हैं... और संस्कृति में आग लगानेवाले यही हैं... और वो सच दिखानेवाला कार्यक्रम किस तरह से भारत की संस्कृति को नुकसान पहुंचा रहा है.. ये कोई नहीं बता रहा.. सब बस यही कह रहे हैं कि किसी के बेडरूम के सवाल पूछकर सामाजिक माहौल ख़राब किया जा रहा है... समझ में नहीं आता इससे सामाजिक माहौल कैसे ख़राब हो रहा है... कोई बताए भी तो कैसे सामाजिक माहौल ख़राब हो रहा है...
ख़ैर अब मैं इससे ज़्यादा अपनी मां से बहस नहीं कर सकता था.. क्योंकि मैं भी उस कार्यक्रम का समर्थक हूं... मां से बहस करने का मतलब बस इतना था कि एक अनुभवी महिला जो समाज का हिस्सा है उनकी सोच क्या है...

